कल 28 जुलाई को झारखंड के 40 हजार से अधिक निजी विद्यालयों के संचालक, शिक्षक, कर्मचारी राज्य सरकार के निर्णयों के खिलाफ काला बिल्ला लगाकर व्यापक विरोध दर्ज करेंगे-आलोक दूबे
*पिछली भाजपा सरकार के द्वारा किए गए आरटीई कानून में संवैधानिक संशोधन को अविलम्ब निरस्त कर सरकार- पासवा अध्यक्ष*
*सरकार ने तो निजी विद्यालयों को यू डाइस के द्वारा पहले ही मान्यता दे दिया है तो फिर मान्यता का प्रश्न कहां से आता है?*
*कोर्ट के स्टे ऑर्डर को ध्यान से अध्ययन करें शिक्षा सचिव - डॉ सुषमा केरकेट्टा*
*शिक्षा प्रबंधन के लिए है नियंत्रण के लिए नहीं - संजय प्रसाद*
*सरकार छोटे छोटे स्कूलों को सहायता करनी चाहिए नां कि प्रताड़ित - राशीद अंसारी*
*पासवा प्रदेश अध्यक्ष आलोक कुमार दूबे का प्रेस कॉन्फ्रेंस*
*साथ में मौजूद रांची महानगर अध्यक्ष डॉ सुषमा केरकेट्टा,प्रदेश सचिव संजय प्रसाद,रांची जिला महासचिव राशीद अंसारी*
प्रदेश पासवा अध्यक्ष आलोक कुमार दूबे ने आज संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कल 28 जुलाई को झारखंड के गैर मान्यता प्राप्त 40 हजार निजी विद्यालयों के प्राचार्य, शिक्षक,कर्मचारी राज्य सरकार के निर्णय के खिलाफ पूरे राज्य में काला बिल्ला लगाकर व्यापक विरोध दर्ज करेंगे। शिक्षा सचिव पूरे राज्य में निजी विद्यालयों को डरा धमका रहे हैं, प्रखंड के शिक्षा पदाधिकारी निजी विद्यालय संचालकों को बुलाकर कठिन शर्तों के मुताबिक मान्यता नहीं होने पर विधालय बन्द करने की धमकी दे रहे हैं।जहां तक मान्यता के लिए आवेदन देने की बात है निजी विद्यालयों ने सभी गाइडलाइन का पालन करते हुए 2009 के आरटीई कानून के मातहत मान्यता के लिए आवेदन पहले ही दिया जा चुका है लेकिन वर्तमान शिक्षा सचिव बार-बार 2019 के संशोधित कानून के तहत मान्यता नहीं लेने पर विद्यालय बंद करने की धमकी दे रहे हैं। शिक्षा सचिव के तुगलकी फरमान को राज्य के निजी विद्यालय मानने से इनकार करते हैं। पासवा अध्यक्ष ने मुख्यमंत्री से इस पर संज्ञान लेने का अनुरोध किया है। उन्होंने कहा निजी विद्यालयों की राज्य में आवश्यकता है या नहीं यह बात स्पष्ट हो जानी चाहिए और अगर नहीं है तो अधिसूचना जारी हो जाए कि निजी विद्यालय हमेशा के लिए बन्द किए जाते हैं।
प्रदेश अध्यक्ष श्री आलोक कुमार दूबे ने स्पष्ट तौर से कहा कि सरकार को यदि छोटे निजी विद्यालय चलने देने हैं इन कठिन शर्तों में दो शर्तों का अनुपालन किसी भी स्थिति में निजी विद्यालयों के लिए संभव नहीं है ।
1. भूमि की बाध्यता पूर्ण रूप से समाप्त होनी चाहिए
(मूल आरटीई में भूमि की कोई बाध्यता है भी नहीं और संपूर्ण राष्ट्र में भूमि के बाध्यता का कहीं कोई जिक्र आरटीआई कानून में नहीं है।)
2. और दूसरी बात कमरे का साइज का कोई मापदंड मूल आरटीई में नहीं किया गया है।
यह शर्तें तो जैक बोर्ड या सीबीएसई बोर्ड की एफीलिएशन के लिए लागू शर्तें है इसे यू डाइस और मान्यता के लिए क्यों लागू कर रही है सरकार?
यह सर्च पिछली सरकार द्वारा संशोधन कर मूल आरटीई में जबरन सिर्फ झारखंड में जोड़ा गया और आश्चर्यजनक बात यह है कि इसे सिर्फ निजी विद्यालयों पर लागू किया गया सरकारी विद्यालयों को इन शब्दों से मुक्ति दी गई।
तो फिर एक ही राज्य में सरकारी विद्यालय के लिए अलग और निजी विद्यालयों के लिए अलग शर्त क्यूं???
और जो माननीय उच्च न्यायालय में यह मामला विचाराधीन है और माननीय उच्च न्यायालय ने स्पष्ट आदेश दिया है कि मान्यता के प्रश्न पर निजी विद्यालयों पर कोई पीड़क कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया है ऐसी स्थिति में मान्यता के लिए एक बार फिर आवेदन देने की बात कोर्ट की आदेश की अवमानना कर क्यूं दिया जा रहा है?
सरकार के आदेश के खिलाफ कल संपूर्ण झारखंड के निजी विद्यालय काला बिल्ला लगाकर अपना विरोध प्रदर्शन करेंगे।
और सरकार एवं सभी राजनीतिक दल के प्रतिनिधियों से यह निवेदन करेंगे जल्द से जल्द इस मामले में संज्ञान लें अन्यथा सरकार के इस तुगलकी फरमान झारखंड के 40 हजार छोटे निजी विद्यालय बन्द हो जाऐंगे एवं बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा।तो दूसरी तरफ
निजी विद्यालयों के लाखों शिक्षक और कर्मचारी रोजगार से वंचित हो जाएंगे।
किराए के मकान में चलने वाले छोटे निजी विद्यालयों के लिए किसी भी स्थिति में शिक्षा सचिव के शर्तों का अनुपालन संभव नहीं है।सरकार ने तो उन्हें यू डाइस के द्वारा पहले ही मान्यता दे दिया है तो फिर मान्यता का प्रश्न कहां से आता है?


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