विश्व हेपेटाइटिस दिवस पर जागरूकता कार्यशाला का आयोजन, वर्ष 2030 तक हेपेटाइटिस उन्मूलन के लिए सरकार प्रतिबद्ध
विश्व हेपेटाइटिस दिवस के अवसर पर आज होटल चाणक्या बीएनआर, रांची में हेपेटाइटिस के लक्षण, बचाव एवं रोकथाम विषय पर कार्यशाला सह जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, झारखंड के अभियान निदेशक श्री शशि प्रकाश झा उपस्थित रहे। कार्यक्रम का उद्देश्य आमजन को हेपेटाइटिस के प्रति जागरूक करते हुए समय पर जांच एवं उपचार के महत्व से अवगत कराना था।
कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए *राज्य नोडल पदाधिकारी डॉ. कमलेश कुमार* ने बताया कि हेपेटाइटिस लीवर में होने वाली सूजन है, जो मुख्य रूप से वायरस के संक्रमण के कारण होती है। इसके पांच प्रमुख प्रकार—हेपेटाइटिस ए, बी, सी, डी एवं ई हैं। इनमें हेपेटाइटिस बी और सी अधिक गंभीर हैं, क्योंकि ये लंबे समय तक शरीर में रहकर लीवर सिरोसिस, लीवर फेलियर एवं लीवर कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं। उन्होंने बताया कि हेपेटाइटिस की वायरल लोड जांच के लिए ट्रूनेट मशीन राज्य के सभी पांच प्रमंडलों को उपलब्ध कराई जा रही है। सरकार वर्ष 2030 तक हेपेटाइटिस उन्मूलन के लक्ष्य को लेकर प्रतिबद्ध है। इस वर्ष विश्व हेपेटाइटिस दिवस की थीम "Let's Break It Down" निर्धारित की गई है।
मुख्य अतिथि एवं राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के *अभियान निदेशक श्री शशि प्रकाश झा* ने कहा कि हेपेटाइटिस से बचाव के लिए जागरूकता सबसे महत्वपूर्ण कदम है। हमें ब्लॉक स्तर तक समुचित कार्ययोजना बनाकर लोगों को इसके प्रति जागरूक करना होगा तथा शीघ्र पहचान एवं स्क्रीनिंग सुनिश्चित करनी होगी। Prevention is only cure को अपनाते हुए इस बीमारी से बचाव किया जा सकता है l उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में बीमारियों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है, ऐसे में अर्ली डायग्नोसिस एवं प्रिवेंशन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। उन्होंने लोगों से स्वस्थ जीवनशैली अपनाने, स्वच्छ भोजन एवं पानी का सेवन करने तथा केवल आवश्यकता पड़ने पर ही रक्त चढ़ाने की अपील की।
कार्यक्रम के दौरान हेपेटाइटिस को मात देकर पूर्णतः स्वस्थ जीवन जी रहे एवं समाज में जागरूकता फैलाने वाले व्यक्तियों को सम्मानित किया गया। इनमें हजारीबाग के पवन पहनु, रामगढ़ के योगेश्वर बेदिया तथा रांची की रूबी देवी एवं मधु देवी शामिल हैं। इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले रिम्स के प्रोफेसर डॉ. अजित डुंगडुंग, डॉ. मनोज कुमार, डॉ. सिद्धार्थ कपूर, डॉ. मुकेश कुमार, डॉ. रश्मि सिन्हा, डॉ. दीवाकर सहित अन्य चिकित्सकों एवं स्वास्थ्यकर्मियों को भी सम्मानित किया गया।
*सिविल सर्जन, रांची डॉ. प्रभात कुमार* ने कहा कि हेपेटाइटिस जैसी बीमारी में "Prevention is Better Than Cure" की अवधारणा को अपनाना अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए जन-जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ समय पर स्क्रीनिंग एवं जांच सुनिश्चित करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि अनावश्यक रक्त चढ़ाने से बचना चाहिए तथा सभी गर्भवती महिलाओं को प्रत्येक गर्भावस्था के दौरान हेपेटाइटिस बी की जांच अवश्य करानी चाहिए। इसके अलावा इंजेक्शन के माध्यम से नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले व्यक्तियों, एचआईवी के साथ जीवन व्यतीत कर रहे लोगों तथा लंबे समय से हीमोडायलिसिस करा रहे मरीजों को भी नियमित रूप से हेपेटाइटिस की जांच करानी चाहिए।
*राज्य महामारी विशेषज्ञ डॉ. प्रवीण कर्ण* ने बताया कि हेपेटाइटिस ए एवं ई दूषित भोजन और पानी के माध्यम से फैलते हैं, जबकि हेपेटाइटिस बी एवं सी संक्रमित रक्त, असुरक्षित इंजेक्शन, संक्रमित सुई, बिना जांच के रक्त चढ़ाने, असुरक्षित यौन संबंध तथा संक्रमित मां से नवजात शिशु में फैल सकते हैं। उन्होंने कहा कि प्रारंभिक अवस्था में इसके लक्षण स्पष्ट नहीं होते, लेकिन बाद में बुखार, अत्यधिक थकान, भूख कम लगना, मतली, उल्टी, पेट के दाहिने हिस्से में दर्द, गहरे रंग का पेशाब तथा आंखों एवं त्वचा का पीला पड़ना जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। ऐसे किसी भी लक्षण के दिखाई देने पर नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र में जाकर जांच अवश्य करानी चाहिए
रिम्स के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर *डॉ. अजित डुंगडुंग* ने बताया कि हेपेटाइटिस सी के लगभग 99 प्रतिशत मामलों का सफल उपचार संभव है। वहीं, हेपेटाइटिस बी के अधिकांश मरीजों को दवा की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन लगभग 5 प्रतिशत मामलों में यह क्रॉनिक रूप ले सकता है, जिसके लिए लंबे समय तक उपचार की आवश्यकता पड़ती है। उन्होंने कहा कि क्रॉनिक हेपेटाइटिस के अधिकांश मरीजों में तब तक कोई लक्षण दिखाई नहीं देते, जब तक कि लिवर को गंभीर नुकसान न पहुंच चुका हो। ऐसे में एक साधारण रक्त जांच के माध्यम से समय रहते संक्रमण की पहचान की जा सकती है। आधुनिक एंटीवायरल थेरेपी से हेपेटाइटिस बी को प्रभावी रूप से नियंत्रित किया जा सकता है, जबकि हेपेटाइटिस सी का उपचार अब अधिकांश मरीजों में केवल मुंह से ली जाने वाली दवाओं से संभव है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, भारत में लगभग 4 करोड़ लोग हेपेटाइटिस B एवं लगभग 60 लाख लोग हेपेटाइटिस C से प्रभावित हैं। ऐसे में समय पर जांच, उपचार एवं जागरूकता ही इस बीमारी की रोकथाम का सबसे प्रभावी उपाय है।
डॉ मनोज कुमार, HOD, माइक्रोबायोलॉजी डिपार्मेंट, रिम्स रांची ने प्रेजेंटेशन के माध्यम से हेपेटाइटिस के विभिन्न पहलुओं एवं रोकथाम पर चर्चा की l
कार्यक्रम में सिविल सर्जन रांची डॉ प्रभात कुमार, उपाध्यक्ष सदर अस्पताल डॉ बिमलेश सिंह,राज्य नोडल पदाधिकारी डॉ कमलेश कुमार, राज्य नोडल पदाधिकारी IEC -डॉ राहुल किशोर, डॉ अजीत डुंगडुंग,प्रोफेसर डिपार्टमेंट ऑफ़ मेडिसिन, रिम्स, डॉ मनोज कुमार,HOD डिपार्टमेंट ऑफ़ माइक्रोबायोलॉजी रिम्स राज्य महामारी रोग विशेषज्ञ डॉ प्रवीण कर्ण समेत विभिन्न कार्यक्रम के राज्य स्तरीय नोडल पदाधिकारी, अन्य चिकित्सक एवं गणमान्य लोग शामिल हुएl


0 Comments