अब नहीं तो कब… अब जागना जरूरी है, महिलाएं - बेटियां बदलाव की वाहक बनें: उपायुक्त
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सामाजिक मानसिकता बदलने का किया आह्वान, कहा - बेटा-बेटी में भेदभाव को इतिहास बनाना होगा
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बाल विवाह मुक्त..., बधाई हो बेटी हुई है..., महिलाओं के लिए आऱक्षण... कई काम हुए है - महिलाओं को मंच मिला है, लेकिन समस्या समाप्त नहीं हुई है – महिलाओं को आगे रख पुरूष पिछे से झांकते हैं - इसे समाप्त करना है
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महिलाओं को अब उठकर कमान संभालने का समय है, राज्य सरकार ने मंईयां सम्मान योजना शुरू किया है, हमने मंईयां सम्मान से उत्थान की शुरूआत की है
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बेटियों का जन्म केवल शादी के लिए नहीं हुआ है, बेटियां समाज राज्य देश की महत्वपूर्ण ह्यूमन रिसोर्स हैं, बेटियों को खुश रहने – आगे बढ़ने का आर्शिवाद दें
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घर के बोर्ड पर पहले अपनी पत्नी का नाम लिखाएं – बेटियां अपने पसंद का पोशाक पहने – पति के निधन पर महिला बिंदी लगाएं - नहीं लगाएं यह उनका निर्णय होना चाहिए
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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर शिबू सोरेन समृति भवन (टाउन हॉल) सभागार में आयोजित महोत्सव में अपने संबोधन में उपायुक्त (डीसी) श्री अजय नाथ झा ने कहा कि समाज में वास्तविक बदलाव तभी संभव है जब महिलाएं और बेटियां आगे आकर नेतृत्व की भूमिका निभाएं।
बेटा-बेटी में भेदभाव की मानसिकता समाप्त करनी होगी
उपायुक्त ने कहा कि समाज में परिवर्तन की प्रक्रिया लंबी होती है। लगभग 100 वर्ष पहले तक सती प्रथा जैसी कुप्रथा समाज में सामान्य बात मानी जाती थी, लेकिन सामूहिक प्रयासों और जागरूकता के कारण उसे समाप्त कर इतिहास बना दिया गया। उसी प्रकार अब बेटा और बेटी में भेदभाव करने वाली मानसिकता को भी समाज से खत्म करना होगा। उन्होंने कहा कि जब तक सोच में बदलाव नहीं आएगा, तब तक वास्तविक समानता संभव* नहीं है।
महिलाओं को मंच मिला है, लेकिन चुनौतियां अभी बाकी
उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में कई महत्वपूर्ण पहलें की गई हैं। प्रशासन ने बाल विवाह के खिलाफ अभियान, बधाई हो बेटी हुई है जैसे सकारात्मक संदेश देने वाले कार्यक्रम तथा पंचायतों और अन्य संस्थाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण जैसी योजनाओं ने महिलाओं को आगे आने का अवसर दिया है।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि कई जगहों पर अभी भी महिलाओं को केवल औपचारिक रूप से पद मिल जाता है, लेकिन निर्णय लेने की शक्ति पुरुषों के हाथ में रहती है। मुखिया पति जैसी प्रवृत्तियां इसी सोच का उदाहरण हैं, जिसे बदलना जरूरी है।
महिलाओं को स्वयं नेतृत्व संभालना होगा
उपायुक्त ने कहा कि अब समय आ गया है कि महिलाएं खुद आगे बढ़कर जिम्मेदारी की कमान संभालें। राज्य सरकार द्वारा शुरू की गई झारखंड मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह योजना महिलाओं के आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने कहा कि इस योजना के माध्यम से महिलाओं के उत्थान और सम्मान की नई शुरुआत की गई है। जिला प्रशासन ने मंईयां सम्मान से उत्थान – आगे बढ़ाने का संकल्प लिया है।
बेटियां समाज और देश की महत्वपूर्ण मानव संसाधन
उन्होंने कहा कि बेटियों का जन्म केवल शादी के लिए नहीं हुआ है। वे समाज, राज्य और देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली मानव संसाधन हैं। इसलिए परिवार और समाज को चाहिए कि वे बेटियों को शिक्षा, अवसर और प्रोत्साहन दें, ताकि वे अपने सपनों को साकार कर सकें।
सामाजिक सोच में बदलाव जरूरी
उपायुक्त ने कहा कि समाज में सम्मान और समानता की भावना को मजबूत करने के लिए छोटे-छोटे बदलाव भी महत्वपूर्ण होते हैं। उन्होंने लोगों से अपील की कि घरों के बाहर लगे बोर्ड पर पत्नी का नाम पहले लिखाने जैसी पहल से भी सम्मान का संदेश दिया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि बेटियां अपनी पसंद का पहनावा पहनें और अपनी जिंदगी से जुड़े फैसले खुद लें। किसी महिला के पति के निधन के बाद वह बिंदी लगाए या न लगाए, यह उसका व्यक्तिगत निर्णय होना चाहिए और समाज को उसका सम्मान करना चाहिए।
अंत में उन्होंने सभी लोगों से आह्वान किया कि बेटियों को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें और ऐसा वातावरण बनाएं, जहां महिलाएं सम्मान, आत्मविश्वास और स्वतंत्रता के साथ जीवन जी सकें।






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