*गुजरे हुए कल का मोहर्रम*
मोहर्रम अरबी कैलेंडर हिजरी का पहला महीना है. इस्लाम में मुसलमान हजरत हुसैन रजि की शहादत को याद कर मोहर्रम को बड़ी श्रद्धा से मनाते हैं यह महीना बहुत ही पवित्र है यह महीना न्याय के लिए संघर्ष और उत्पीड़न के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक है इस महीना हजरत मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 निर्दोष और निहत्थे साथियों की शहादत
बर्बरतापूर्ण इराक के मैदान कर्बला में कर दी गई थी. मोहर्रम महीना चांद निकलने के साथ 10 दिनों तक शहादत की याद में मनाया जाता है जिसे असुरा कहते हैं अब तो मोहर्रम का जुलूस में लोगों का जज्बा,जुनून और लगन में काफ़ी कमी आयी है और धीरे-धीरे समय और जीवन की आपधापी के साथ जुलूस में काफी बदलाव आया 70- 80 के दशक में रांची में निकलने वाला मोहर्रम का जुलूस आधी रात 3:00 बजे निकला करता था उस समय बरियातु,कांटा टोली चन्दवे, कांके, भिट्टा,का जुलूस 5:00 बजे तक मेन रोड टैक्सी स्टैंड और लेक रोड प्रवेश कर जाता था और खिलाड़ी अपने खेल का प्रदर्शन किया करते थे और 7 और 8 बजे के बीच अखाड़ा धारी अपने गंतव्य स्थान के लिए कूच कर जाया करते थे रास्ते में अखाड़ाधारियों को शरबत और पानी पिलाने के लिए हर धर्म के लोग आपस में मिलकर उनकी सेवा किया करते थे और फिर शाम ढलते ही ढ़ोल ताशे बाजे के साथ अपने मोहल्ला स्थित इमामबाड़ा में नियाज़ फातिहा किया करते थे यह परंपरा आज भी जारी है उस समय गैरमुस्लिम भी अपने बच्चों को लेकर इमामबाड़ा में आकर झाड़ फूँक कराया करते थे और बच्चों की लंबी उम्र और स्वास्थ्य की दुवाएँ लेकर जाया करते थे मोहर्रम की 10 तारीख को हिन्दीपीडी, लेक रोड और गुदडी से बाघ की शक्ल बनाकर युवाओ की एक टोली निकला करती थी जो मोहल्ले और गलियों में जाकर अपने कला का प्रदर्शन किया करते थे इसके बदले मोहल्ला वासी उन्हें नजराना के रूप मे आर्थिक सहयोग किया करते थे यह सिलसिला 20-25 साल तक लगातार चला. उस समय हिंदू मुस्लिम एकता और भाईचारा मोहर्रम में देखने को मिलती थी परंतु 1968 के हिंदू मुस्लिम दंगा के बाद एक समय ऐसा भी आया की मोहर्रम का जुलूस को पार करने में सामाजिक कार्यकर्ता जय सिंह यादव के पिता स्वर्गीय किशोरी सिंह यादव ने बड़ी भूमिका अदा की इन्होने हिंदू मुस्लिम भाईचारगी की मिसाल को पेश करते हुए अपने नेतृत्व में मोहर्रम के जुलूस को रातू रोड, गांधी चौक से पार कराया और हिंदू मुस्लिम एकता और भाईचारगी की मिसाल पेश की.
प्रस्तुति- FAZAL MURTAZA रांची


0 Comments